विश्व मंगल साधना के हम हैं मौन पुजारी
आराधक है विश्व शांति के अक्षयटेक हमारी
विश्व मंगल साधना के हम हैं मौन पुजारी
विविध पंथ मत दर्शन शैली भाषा रीति विधान प्रणाली
एक सचिदानन्द रूप की भव्य श्राष्टि यह सारी
विश्व मंगल साधना के हम हैं मौन पुजारी
अर्थ काम के पीछे सब नर भाग रहे हैं अंधे हो कर
धर्म भाव से दूर करेंगे विक्रति स्वेचछाचारी
विश्व मंगल साधना के हम हैं मौन पुजारी
वलिहीनों को नहीं पूछता बलबानो को विश्व पूजता
संघ शक्ति युग सत्य आज है मानवता हितकारी
विश्व मंगल साधना के हम हैं मौन पुजारी
संघ शक्ति यह विजय शालिनी खलसंहारक धर्म रक्षिणी
नये विस्व का स्रजन करेगी सब जन मंगलकारी
विश्व मंगल साधना के हम हैं मौन पुजारी
इस ब्लॉग को लिखने का एक ही मकसद है देश भक्ति गीत और संघ के गीतो के माध्यम से हर इंसान के अंदर के भारतीय को जगाना |
गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011
सोमवार, 5 सितंबर 2011
Kavita
कातिलों की मुक्ति का विधान हो गया यहां
आज देशद्रोही भी महान हो गया यहां।
इक रिवाल्वर ने देशभक्ति को डरा दिया,
कातिलों की टोलियों को रहनुमा बना दिया।
कल लिए हुए खड़ा था बम बनाती टोलियां,
जो उजाड़ता रहा है मेहंदी, मांग, रोलियां।
जो सदा वतन की लाज को उघाड़ता रहा,
और भारती का मानचित्र फाड़ता रहा।
जो नकारता रहा है देश के विधान को,
थूकने की चीज मानता था संविधान को।
इसके सर पे ताज धरके हो रही है आरती,
रो रहा है देशप्रेम, रो रही है भारती।
जो हमारी रोती मातृभूमि को सुकून दे,
और देश द्रोहियों को गोलियों से भून दे,
ऐसे सरफरोश का हमें प्रकाश चाहिए,
देश के लिए पटेल या सुभाष चाहिए।
आज देशद्रोही भी महान हो गया यहां।
इक रिवाल्वर ने देशभक्ति को डरा दिया,
कातिलों की टोलियों को रहनुमा बना दिया।
कल लिए हुए खड़ा था बम बनाती टोलियां,
जो उजाड़ता रहा है मेहंदी, मांग, रोलियां।
जो सदा वतन की लाज को उघाड़ता रहा,
और भारती का मानचित्र फाड़ता रहा।
जो नकारता रहा है देश के विधान को,
थूकने की चीज मानता था संविधान को।
इसके सर पे ताज धरके हो रही है आरती,
रो रहा है देशप्रेम, रो रही है भारती।
जो हमारी रोती मातृभूमि को सुकून दे,
और देश द्रोहियों को गोलियों से भून दे,
ऐसे सरफरोश का हमें प्रकाश चाहिए,
देश के लिए पटेल या सुभाष चाहिए।
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
*गीत*
युग युग से हिन्दुत्व सुधा की ,बरस रही मंगलमय धार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार||
भारत ने ही सारे जग को ज्ञान और विज्ञान दिया
अनुपम स्नेह भरी द्रष्टि से जन जन का उपकार किया
जननी की पवन पूजा का सुखमय रूप हुआ साकार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार||
भारत अपने भव्य रूप को धरती पर फिर प्रकटाए
नष्ट करे सारे दोषो को समरसता फिर सरसाए
पुण्य धरा के अमर पुत्र हम पहचाने निज शक्ति अपार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार ||
भारत भक्ति ह्रदय मे भरकर अनथक तप दिन रात करें
शाखा रूपी नित्य साधना सुंदर सुगठित रूप वरें
निर्भय होकर बढ़े निरंतर द्रढता से जीवन व्रत धार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार ||
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार||
भारत ने ही सारे जग को ज्ञान और विज्ञान दिया
अनुपम स्नेह भरी द्रष्टि से जन जन का उपकार किया
जननी की पवन पूजा का सुखमय रूप हुआ साकार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार||
भारत अपने भव्य रूप को धरती पर फिर प्रकटाए
नष्ट करे सारे दोषो को समरसता फिर सरसाए
पुण्य धरा के अमर पुत्र हम पहचाने निज शक्ति अपार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार ||
भारत भक्ति ह्रदय मे भरकर अनथक तप दिन रात करें
शाखा रूपी नित्य साधना सुंदर सुगठित रूप वरें
निर्भय होकर बढ़े निरंतर द्रढता से जीवन व्रत धार
भारत की हो जय-जयकार भारत की हो जय-जयकार ||
सोमवार, 20 जून 2011
गीत
धरती की शान तू है मनु की संतान
तेरी मुठ्ठीयो मे बंद तूफान है रे
मनुष्य तू बड़ा महान है
भूल मत,मनुष्य तू बड़ा महान है ||
तू जो चाहे पर्वत पहाड़ों को फोड़ दे
तू जो चाहे नदियों के मुख को मोड़ दे
तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड़ दे
तू जो चाहे धरती से अम्बर को जोड़ दे
अमर तेरे प्राण,मिला तुझको वरदान
तेरी आत्मा मे स्वय भगवान हैं रे ||
नयनों मे ज्वाल तेरी गति मे भूचाल
तेरी छाती मे छुपा महाकाल है रे
प्रथवी के लाल तेरा हिमगिरि सा भाल
तेरी भ्रकूटी मे तांडव का ताल है रे
निज को तू जान जान ज़रा शक्ति पहचान
तेरी वाणी मे युग का आहवान है रे ||
धरती सा धीर तू है अग्नि सा वीर
तू जो चाहे काल को भी थाम ले
पापों का प्रलय रुके पशुता का शीश झुके
तू जो अगर हिम्मत से काम ले
गुरु सा मतिमान, पवन सा तू गतिमान
तेरी नभ से भी उँची उड़ान है रे ||
तेरी मुठ्ठीयो मे बंद तूफान है रे
मनुष्य तू बड़ा महान है
भूल मत,मनुष्य तू बड़ा महान है ||
तू जो चाहे पर्वत पहाड़ों को फोड़ दे
तू जो चाहे नदियों के मुख को मोड़ दे
तू जो चाहे माटी से अमृत निचोड़ दे
तू जो चाहे धरती से अम्बर को जोड़ दे
अमर तेरे प्राण,मिला तुझको वरदान
तेरी आत्मा मे स्वय भगवान हैं रे ||
नयनों मे ज्वाल तेरी गति मे भूचाल
तेरी छाती मे छुपा महाकाल है रे
प्रथवी के लाल तेरा हिमगिरि सा भाल
तेरी भ्रकूटी मे तांडव का ताल है रे
निज को तू जान जान ज़रा शक्ति पहचान
तेरी वाणी मे युग का आहवान है रे ||
धरती सा धीर तू है अग्नि सा वीर
तू जो चाहे काल को भी थाम ले
पापों का प्रलय रुके पशुता का शीश झुके
तू जो अगर हिम्मत से काम ले
गुरु सा मतिमान, पवन सा तू गतिमान
तेरी नभ से भी उँची उड़ान है रे ||
शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011
कविता
हे शारदे सद्बुद्धि बल दो
राष्ट्र भक्ति प्रबल दो
शील दो व्यवहार में
और सत्यनिष्ठा अचल दो।
दो सहस्र ईसा से पहले,
छोड़ गई क्यों भारत को?
'नदीतमा' बन वापस आओ
नित्य शुभ्र शुभ स्नान दो।
नील तारा श्री हमें दो
शिव संकल्प महान दो
ज्ञान दो विज्ञान दो
चारित्र्य का उत्थान दो।
रूप दो मातंगिनी
और पाप को अवसान दो
हे स्फटिका भारत को पुन:
गुरुता का अनुपम दान दो।
अब दिव्यता दो वतन को
भारत को नूतन प्राण दो
स्व हृदय में स्थान दो
मां, यही अभिमान दो।
हे वीणावादिनी सरगम की
लय को सच्चा प्रतिमान दो
हे हंसवाहिनी परमहंस बन जाएं
हम क्रियमाण दो।
ज्ञान ग्रंथों के जलधि को
प्रखर अभेद्य उफान दो
लुप्त हुई विद्याओं को
अनुभूत अनुसंधान दो।
मंजुलहासिनी हर्ष दो
मन को उमंगित गान दो
हे ब्राह्मणी इन्द्रियों को
वश कर सकूं यही वरदान दो।
पुन: विश्व गुरु गरिमा पाए
राष्ट्र उच्च सोपान दो
पुन: स्वर्ण चिड़िया कहलाए
राष्ट्र, गर्व का भान दो।
अंत काल में मातृभूमि हित
मरूं यही सम्मान दो
सिर्फ यही सम्मान दो
मां बस इतना सम्मान दो।
राष्ट्र भक्ति प्रबल दो
शील दो व्यवहार में
और सत्यनिष्ठा अचल दो।
दो सहस्र ईसा से पहले,
छोड़ गई क्यों भारत को?
'नदीतमा' बन वापस आओ
नित्य शुभ्र शुभ स्नान दो।
नील तारा श्री हमें दो
शिव संकल्प महान दो
ज्ञान दो विज्ञान दो
चारित्र्य का उत्थान दो।
रूप दो मातंगिनी
और पाप को अवसान दो
हे स्फटिका भारत को पुन:
गुरुता का अनुपम दान दो।
अब दिव्यता दो वतन को
भारत को नूतन प्राण दो
स्व हृदय में स्थान दो
मां, यही अभिमान दो।
हे वीणावादिनी सरगम की
लय को सच्चा प्रतिमान दो
हे हंसवाहिनी परमहंस बन जाएं
हम क्रियमाण दो।
ज्ञान ग्रंथों के जलधि को
प्रखर अभेद्य उफान दो
लुप्त हुई विद्याओं को
अनुभूत अनुसंधान दो।
मंजुलहासिनी हर्ष दो
मन को उमंगित गान दो
हे ब्राह्मणी इन्द्रियों को
वश कर सकूं यही वरदान दो।
पुन: विश्व गुरु गरिमा पाए
राष्ट्र उच्च सोपान दो
पुन: स्वर्ण चिड़िया कहलाए
राष्ट्र, गर्व का भान दो।
अंत काल में मातृभूमि हित
मरूं यही सम्मान दो
सिर्फ यही सम्मान दो
मां बस इतना सम्मान दो।
बुधवार, 13 अप्रैल 2011
कलम, आज उनकी जय बोल
जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएँ,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
केशव ने जो रच डाला
माधव ने वह कर डाला
विश्व जय बोल रहा है आज
तू भी अपने मुख को खोल
कलम, आज उनकी जय बोल
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
पीकर जिनकी लाल शिखाएँ
उगल रही सौ लपट दिशाएँ,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल
केशव ने जो रच डाला
माधव ने वह कर डाला
विश्व जय बोल रहा है आज
तू भी अपने मुख को खोल
कलम, आज उनकी जय बोल
शनिवार, 5 फ़रवरी 2011
अब जाग उठे हैं हम
अब जाग उठे हैं हम कुछ करके दिखा देंगे
हे माँ तेरे चरणों मे आकाश झुका देंगे ||
अब ज़ोश में आये हैं अब होश में आये
अब उठ बैठे हैं हम तूफान मचा देंगे ||
सदियों की गुलामी को हम सबने भगाया है
दुनिया के लुटेरों को दुनियां से मिटा देंगे
हे माँ तेरे चरणों मे आकाश झुका देंगे ||
आंशू न बहा माता मोती न लूटा माता
हम तेरे पसीने पे खून अपना बहा देंगे
हे माँ तेरे चरणों मे आकाश झुका देंगे ||
हे माँ तेरे चरणों मे आकाश झुका देंगे ||
अब ज़ोश में आये हैं अब होश में आये
अब उठ बैठे हैं हम तूफान मचा देंगे ||
सदियों की गुलामी को हम सबने भगाया है
दुनिया के लुटेरों को दुनियां से मिटा देंगे
हे माँ तेरे चरणों मे आकाश झुका देंगे ||
आंशू न बहा माता मोती न लूटा माता
हम तेरे पसीने पे खून अपना बहा देंगे
हे माँ तेरे चरणों मे आकाश झुका देंगे ||
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